ट्रैफ़िक जाम की समस्या से निजात दिलाने वाली तकनीक

एक मोटे अनुमान के मुताबिक़ 2015 में दुनिया भर में 1.3 अरब गाड़ियां थीं. विकासशील देशों में गाड़ियों की बिक्री के हिसाब से माना जा रहा है कि 2040 तक दुनिया भर में क़रीब 2 अरब गाड़ियां सड़कों पर होंगी.

नई सड़कें, बाईपास और फ्लाईओवर बनने के बावजूद, इन गाड़ियों को तेज़ रफ़्तार से चलाने के लिए पर्याप्त जगह नहीं होगी. यानी आने वाले दौर में ट्रैफ़िक जाम की समस्या और बढ़ेगी.

इन जाम से निपटने के लिए लोग अक़्लमंद मशीनों की तरफ़ बड़ी उम्मीद से देख रहे हैं. उन्हें लगता है कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से हम ट्रैफिक जाम से राहत पा सकते हैं.

बेंगलुरु का मॉनिटरिंग सिस्टम
कुछ लोग ख़ुद से चलने वाली गाड़ियों को हर मर्ज़ की दवा मानते हैं. क्योंकि रोबोट से चलने वाली ये गाड़ियां ट्रैफ़िक के नियम नहीं तोड़ेंगी. लेन में चलेंगी और मुश्किल वक़्त में ज़्यादा तेज़ी से फ़ैसले ले सकेंगी. लेकिन, अभी सड़कों पर सेल्फ ड्राइविंग कारों का असर दिखने में कम से कम दो दशक लगेंगे.

पर, अगले दो दशकों में योजना बनाने वालों को दिनों-दिन बढ़ती गाड़ियों की भीड़ से निपटना होगा. ऐसा सिस्टम विकसित करना होगा, जो जाम लगने पर फ़ौरन इससे निजात दिलाने में जुट जाए.

बेंगलुरु में व्यस्त समय के दौरान ट्रैफ़िक की रफ़्तार औसतन 4 किलोमीटर प्रति घंटे होती है. यानी ये कछुए की तरह रेंगता है.

इस जाम से निपटने के लिए सीमेंस कंपनी ने एक मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित किया है. ये सिस्टम ट्रैफिक कैमरों की मदद से जाम पर निगाह रखता है. किसी भी सड़क पर गाड़ियों की तादाद के हिसाब से आगे चल कर लगने वाले जाम का पहले से अंदाज़ा लगा लेता है. इसके बाद ट्रैफिक लाइटें इस तरह जलाई-बुझाई जाती हैं कि जाम न लगे.

हमारे ट्रैफिक सिस्टम को इस तरह काम करने के लिए ढेर सारे आंकड़े चाहिए. आज सीसीटीवी कैमरों से लेकर कारों में लगे नेविगेशन सिस्टम तक, ऐसे ढेर सारे आंकड़े मुहैया करा रहे हैं. बहुत से कैमरे तो सड़कों पर ही लगाए गए हैं, ताकि गाड़ियों की तादाद का अंदाज़ा लगाया जा सके.

आर्टिफ़िशियल इंटलिजेंस की मदद

अमरीका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर गैबोर ओरोस्ज़ कहते हैं, "न्यूटन के समय से ही इंसान गणित के मॉडल की मदद से अपनी मुश्किलों का हल तलाशने लगा था. अगर हमारे पास आंकड़े हैं, तो हम बहुत सी चुनौतियों से पार पा सकते हैं. ये बात ट्रैफ़िक जाम पर भी लागू होती है.'

इसीलिए आज आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से ट्रैफ़िक जाम को कम करने की कोशिशें हो रही हैं. लंदन के मशहूर एलन तुरिग इंस्टीट्यूट और टोयोटा मोबिलिटी फाउंडेशन ने मिलकर हाल ही में नया प्रोजेक्ट शुरू किया है. इसका मक़सद ट्रैफ़िक मैनेजमेंट सिस्टम को इतना बेहतर बनाना है कि वो जाम लगने सी पहले ही भविष्यवाणी कर सके और इससे निपटने के निर्देश ख़ुद ही दे.

टोयोटा फ़ाउंडेशन के रिसर्च प्रमुख विलियम शर्निकॉफ़ कहते हैं कि, 'अक़्लमंद मशीनें हमारी भविष्यवाणी करने की क्षमता को काफ़ी बढ़ा सकती हैं. शहरों के मैनेजर इनकी मदद से तेज़ी से फ़ैसले ले सकते हैं. सिग्नल और गाड़ियों के रूट में बदलाव कर के ट्रैफ़िक जाम से लोगों को बचा सकते हैं.'

अमरीका के पिट्सबर्ग शहर में ऐसा ट्रैफ़िक मैनेजमेंट सिस्टम 2012 से ही आज़माया जा रहा है. कार्नेगी मेलॉन यूनिवर्सिटी के डेवेलप किए गए सिस्टम सरट्रैक की मदद से ट्रैफिक की निगरानी की जाती है. ज़रूरत पड़ने पर रूट डायवर्ज़न या ट्रैफिक सिग्नल में बदलाव कर के जाम लगने से रोका जाता है. दावा किया जा रहा है कि इससे पिट्सबर्ग में ट्रैफिक जाम में 40 प्रतिशत की कमी आई है. गाड़ियों से होने वाला प्रदूषण भी 25 फ़ीसद तक कम हुआ है.

इस सिस्टम को काम करने के लिए वीडियो फीड चाहिए होती है. ये सड़कों की लाइव तस्वीरें होती हैं, जो सरट्रैक को ये अंदाज़ा लगाने में मदद करती हैं कि कहां जाम लग सकता है. फिर उसी हिसाब से दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं और ट्रैफिक डायवर्ज़न किया जाता है.

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